नागौर अपनी ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक धरोहर के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां की एक खास कला आज भी लोगों को आकर्षित करती है—साने (सोने) पर नगीने बिठाने का काम।
यह कोई साधारण ज्वेलरी कार्य नहीं, बल्कि एक अद्भुत और महीन हस्तकला है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है।

🏡 भठड़ियों का चौक: जहां बसती है सुनारों की कला
बाठड़ियों का चौक नागौर का वह स्थान है जहां ब्राह्मण सुनारों का बास है। यहां के कारीगर वर्षों से साने पर बारीक काम करने के लिए प्रसिद्ध हैं।
यहां हर घर में कोई न कोई इस कला से जुड़ा है—
- कोई मीना (Meenakari) करता है
- कोई जड़ाई (Stone Setting)
- तो कोई गढाई (Gold Shaping)
लेकिन सबसे खास है नगीने बिठाने की कला।
💬 कारीगरों की जुबानी – हुनर की असली कहानी
इस विशेष कला को समझने के लिए हमने यहां के अनुभवी कारीगरों से बातचीत की:
- Manish Bademra
- Vinod Sarvwardiya (Chuto Kaka)
- Kapil Katta
- Manish Katta (Pinu Soni)
इन कारीगरों ने बताया कि यह काम केवल हाथों का नहीं, बल्कि धैर्य, अनुभव और वर्षों की साधना का परिणाम है।
🔍 बिना चिपकाए नगीना कैसे टिकता है?
इस कला की सबसे खास बात यह है कि इसमें कोई गोंद या केमिकल इस्तेमाल नहीं होता।
👉 कारीगर सोने में बेहद महीन कट बनाकर उसमें नगीना इस तरह फिट करते हैं कि वह सालों तक नहीं निकलता।
👉 चाहे रोज पहनने वाला गहना हो या शादी-ब्याह का,
नगीने की पकड़ इतनी मजबूत होती है कि उसे निकालना आसान नहीं।
🎨 क्यों है यह कला खास?
- पूरी तरह हैंडमेड और पारंपरिक तकनीक
- बिना केमिकल के लंबे समय तक टिकाऊ
- हर पीस में अलग पहचान
- नागौर की स्थानीय विरासत का प्रतीक
💬 कारीगरों की जुबानी – हुनर की असली कहानी
इस विशेष कला को समझने के लिए हमने बाठड़ियों का चौक के अनुभवी कारीगरों से बातचीत की:
- Manish Bademra
👉 “जब हम नगीना बिठाते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे सोने में जान डाल रहे हों… हर पीस हमारे लिए एक नई कहानी होता है।”
- Vinod Sarvwardiya (Chuto Kaka)
👉 “आज के बच्चे मशीनों पर भरोसा करते हैं, लेकिन असली भरोसा हाथ की पकड़ में होता है… यही पकड़ नगीने को सालों तक संभाले रखती है।”
- Kapil Katta
👉 “इस काम में जल्दबाजी की कोई जगह नहीं… एक छोटी सी गलती पूरा डिजाइन बिगाड़ सकती है, इसलिए हर नगीना सोच-समझकर बिठाया जाता है।”
- Manish Katta (Pinu Soni)
👉 “हमारे लिए यह सिर्फ रोजगार नहीं है, यह हमारी पहचान है… जब कोई ग्राहक सालों बाद भी वही गहना पहनकर आता है, तो गर्व महसूस होता है।”
❓ सवाल-जवाब (Interview Highlight)
सवाल: साने पर नगीना बिना चिपकाए सालों तक कैसे टिकता है?
जवाब (कारीगर):
“इसमें असली कला ‘फिटिंग’ की होती है। हम सोने में इतना बारीक कट बनाते हैं कि नगीना उसमें कसकर बैठ जाता है। यह पूरी तरह हाथ का हुनर है, इसलिए सालों तक नगीना ढीला नहीं पड़ता।”
✨ सोने से ज्यादा कीमती है यह हुनर
नागौर में साने पर नगीने बिठाने का काम सिर्फ गहनों तक सीमित नहीं है…
यह उन हाथों की कहानी है, जिन्होंने समय के साथ खुद को नहीं बदला, बल्कि परंपरा को संभाले रखा।
यहां बनने वाला हर गहना एक “पीस” नहीं, बल्कि
👉 एक परिवार की विरासत
👉 एक कारीगर की पहचान
👉 और एक शहर की शान होता है
🕰️ पीढ़ियों से चलती आ रही कला
बाठड़ियों का चौक में यह काम आज का नहीं है।
यहां के कारीगर बताते हैं कि उनके दादा-परदादा भी यही काम करते थे।
👉 पहले यह कला राजघरानों और खास मौकों के लिए होती थी
👉 आज आम लोग भी इसे पसंद करते हैं
लेकिन तरीका… आज भी वही पुराना है—
हाथ, धैर्य और बारीकी।
⚠️ बदलते दौर की चुनौती
आज बाजार में मशीन से बने गहनों की भरमार है—
👉 सस्ते
👉 जल्दी तैयार
👉 एक जैसे डिजाइन
लेकिन इसके सामने यह पारंपरिक कला खड़ी है—
👉 मेहनत ज्यादा
👉 समय ज्यादा
👉 लेकिन गुणवत्ता बेमिसाल
कारीगरों का कहना है—
“डर यह नहीं कि काम खत्म हो जाएगा, डर यह है कि लोग इसकी असली कीमत समझना बंद कर देंगे।”
❤️ जब गहना बनता है याद
यहां बने गहने सिर्फ पहनने के लिए नहीं होते—
👉 यह शादी की याद बनते हैं
👉 पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते हैं
👉 और कई बार भावनाओं से जुड़ जाते हैं
जब कोई ग्राहक सालों बाद वही गहना लेकर आता है और कहता है—
“आज भी नगीना वैसा ही है…”
तो यही कारीगरों की सबसे बड़ी कमाई होती है।
📉 नई पीढ़ी क्यों दूर हो रही?
👉 मेहनत ज्यादा, कमाई कम
👉 आधुनिक शिक्षा और दूसरी नौकरियों का आकर्षण
👉 धैर्य की कमी
इसी वजह से यह कला धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है।
🟢 क्या बच पाएगी यह विरासत?
सवाल बड़ा है… लेकिन जवाब अभी भी उम्मीद से भरा है।
अगर—
✔️ लोग हैंडमेड काम को महत्व दें
✔️ स्थानीय कला को सपोर्ट करें
✔️ नई पीढ़ी को सिखाया जाए
तो यह कला सिर्फ बचेगी ही नहीं,
👉 बल्कि दुनिया में पहचान बना सकती है।
⚠️ धीरे-धीरे खत्म होती परंपरा?
कारीगरों का कहना है कि आज की मशीनों और रेडीमेड ज्वेलरी के दौर में यह कला धीरे-धीरे कम हो रही है।
👉 नई पीढ़ी इस काम में कम रुचि ले रही है
👉 मेहनत ज्यादा, मुनाफा कम
फिर भी, बाठड़ियों का चौक आज भी इस कला को जीवित रखे हुए है।
🟢 निष्कर्ष
नागौर की यह कला केवल एक काम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान है।
साने पर नगीने बिठाने का यह हुनर आज भी यहां के कारीगरों की मेहनत और लगन की मिसाल है।
👉 जरूरत है इसे संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की। Today Gold Price
❓ 1. साने पर नगीने बिठाने की कला क्या है?
यह एक पारंपरिक ज्वेलरी तकनीक है जिसमें सोने में बारीक कट बनाकर नगीने फिट किए जाते हैं, बिना किसी गोंद या केमिकल के।
❓ 2. क्या बिना गोंद के नगीना लंबे समय तक टिक सकता है?
हाँ, अगर सही तकनीक से फिटिंग की जाए तो नगीना सालों तक नहीं निकलता। यह पूरी तरह कारीगर के अनुभव पर निर्भर करता है।
❓ 3. नागौर का बाठड़ियों का चौक क्यों प्रसिद्ध है?
यह स्थान ब्राह्मण सुनारों का प्रमुख क्षेत्र है, जहां पीढ़ियों से साने पर नगीने बिठाने की कला की जाती है।
❓ 4. ज्वेलरी में मीना, जड़ाई और गढ़ाई में क्या अंतर है?
मीना रंग भरने की कला है, जड़ाई नगीने फिट करने का काम है और गढ़ाई सोने को आकार देने की प्रक्रिया है।
❓ 5. क्या यह पारंपरिक कला आज भी जीवित है?
हाँ, लेकिन धीरे-धीरे कम हो रही है। फिर भी नागौर जैसे स्थानों पर यह कला आज भी जिंदा है।